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#Pune | नैनो उपग्रह निर्माण पर इसरो के प्रयास

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डॉ. भानु पंत के विचारः एमआईटी में २७ वे दार्शनिक संतश्री ज्ञानेश्वर-तुकाराम स्मृती व्याख्यान श्रृंखला में कहा

पुणे ब्यूरो: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन आधुनिक तकनीक के साथ सामग्री जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके नैनो उपग्रह विकसित कर रहा है. जो सृष्टि पर मनुष्य के जीवन स्तर को ऊपर उठाने में मदद करेगा. साथ ही भारतीय लघु रूप लघुरूप इन्सैट जो राष्ट्रीय उपग्रह का संक्षिप्त रूप है, जिसका उपयोग संचार,उपग्रह प्रसारण, मौसम विज्ञान, अनुसंधान और अन्य कार्यों के लिए किया जाता है. ऐसे विचार इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. भानु पंत ने व्यक्त किए.

एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, विश्व शांति केंद्र (आलंदी), माईर्स एमआईटी, पुणे, भारत और संतश्री ज्ञानेश्वर-संतश्री तुकाराम महाराज स्मृती व्याख्यानमाला न्यास के संयुक्त तत्वावधान में यूनेस्को अध्ययन के तहत आयोजित २७ वे दार्शनिक संतश्री ज्ञानेश्वर तुकाराम स्मृति व्याख्यानमाला में चौथे सत्र में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे.

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व शांति केंद्र (आलंदी) के संस्थापक अध्यक्ष और यूनेस्को अध्ययन के प्रमुख प्रो.डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने निभाई.

साथ ही बौद्ध धर्म के प्रकांड विद्वान राहुल भंते बोधि, एमआईटी डब्ल्यू पीयू के कुलपति डॉ. आर.एम.चिटणीस, प्र कुलपति डॉ. तपन पांडा, और डॉ.मंदार लेले उपस्थित थे.

डॉ. भानु पंत ने कहा, १९६३ से शुरू हुई इसरो की यात्रा २०२२ तक पहुंच चुकी है. इसरो का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास करना और विभिन्न राष्ट्रीय कार्यों में इसका उपयोग करना है. १९६० से ७० के दशक में अग्निशमन विकास कार्यक्रम पूरा किया. १९८० के दशक में, सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन व्हीकल ३ बनाया गया था और सबसे उन्नत ध्रुवीय अवलोकन उपग्रह और भूस्थैतिक उपग्रह बनाए गए थे. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण यान का कार्य १९७० से प्रारम्भ हुआ. ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान इसरो की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.

इसरो का गगनयान एक लंबा जहाज है. भारत का सुदूर संवेदन उपग्रह यह उपग्रहों की एक श्रृंखला है जो पृथ्वी पर किसी भी स्थान के साथ संचार कर सकता है. ओशनसैट श्रृंखला को मुख्य रूप से महासागरों का अध्ययन करने के लिए विकसित किया गया था. भारत ने जी सैट श्रृंखला के तहत प्रायोगिक भूस्थिर उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है. इसके अलावा पृथ्वी पर भारत का पहला मिशन चंद्रयान १ था, जिसके बाद चंद्रयान २ आया.

प्रो.डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने कहा, मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए. शरीर, बुद्धि, आत्मा और मन के गणित को समझना जरूरी है. जिस तरह से विज्ञान नैनो उपग्रहों पर शोध कर रहा है. इसी प्रकार मनुष्य को सूक्ष्म आत्मा की खोज करते हुए सुख, संतोष और शांति के लिए अध्यात्म की ओर अग्रसर होना चाहिए.

इसके पूर्व प्रातः कालीन सत्र में मुंबई के प्रसिद्ध शिक्षाविद रमेश पानसे ने शिक्षा बदल रही है विषय पर विचार व्यक्त किए.

पुणे के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जगदीश हिरेमठ ने कहा जिंदगी सांप सीढी के खेल की तरह है. अर्थात हाथ में आई किसी चीज का अचानक चले जाना या किसी ऐसी चीज का अचानक मिल जाना जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी, इसे हम भाग्य का किस्मत का पासा पलटना कह सकते हैं. कर्म योग, क्रिया और दैव योग सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं. भाग्य को अपने पक्ष में करने के लिए कड़ी मेहनत करें और समय का पालन करें.

प्रो. मिलिंद पात्रे ने सूत्रसंचालन किया. प्रो.डॉ. तपन पांडा ने आभार माना.

 

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