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ज्यादा रिटर्न के लिए फादर ने एजुकेशन में इंवेस्ट किया : आईपीएस नुरूल हसन

आईपीएस अधिकारी नुरूल हसन अब महाराष्ट्र की उपराजधानी में डीसीपी के रूप में काम करेंगे. एक गरीब परिवार से ताल्लुख रखने वाले नुरूल हसन का पिलीभित के छोटे से कस्बे से नागपुर तक पहुंचने का सफर बेहद कठिण और दूसरों को प्रेरित करने वाला रहा है.

नुरूल हसन उत्तर प्रदेश के पिलीभित जिले के हररायपुर गांव के रहने वाले है. उन्होंने अपनी 10 वीं कक्षा तक की शिक्षा पिलीभित की सरकारी स्कूल में पूर्ण की. स्कूल की छत टपकती थी तो घर से बोरी ले जाकर उस पर बैठ कर वो अपने मित्रों के साथ पढ़ाई करते थे. पिताजी का खेत था, इसी से परिवार का जीवन यापन हो रहा था. उनके पिता निजी स्कूल में नहीं पढ़ा पा रहे थे. अपनी दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई नुरूल हसन ने पिलीभित की स्कूल में ही की.

दसवीं के बाद उनके पिता शमशुल हसन को जॉब मिली तो वे बरेली आ गए. यहां पर 12 वीं तक की पढ़ाई भी सरकारी स्कूल में ही की. आगे बीटेक करना चाहते थे. तैयारी के लिए 30 हजार चाहिए थे, जो कोचिंग के लिए देने थे. तो पिताजी ने एक एकड़ खेती बेच दी. पिता ने तय किया कि शिक्षा में इंवेस्ट करेंगे तो इससे ज्यादा रिटर्न मिलेगा. हालांकि अलिगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया और वहां से उन्होंने बीटेक किया. मल्टीनेशनल कंपनी सीमेंस और टीसीएस में भी उन्होंने काम किया. इसके बाद भाभा में साइंटिस्ट के रूप में काम किया. यही पर सोचा कि सिविल सर्विस की तैयारी की जाए.


अब नागपुर में डीसीपी की कमान संभालेंगे नुरूल हसन


उनका कहना है कि जब वे बरेली में रहते थे तो जिस इलाके में वो रहते थे वहां सड़क, बिजली नहीं थी. जबकि अन्य इलाकों में ये सभी सुविधाएं मौजूद थी. उसी समय सवाल जेहन में आता था कि आखिर ऐसा क्यों है? इसको दूर कैसे कर सकते है? जवाब मिलता था कि सिविल सर्विस के माध्यम से आप इसे दूर कर सकते है. बीटेक में जाने के बाद यूनिवर्सिटी में जब आईएएस और आईपीएस अधिकारियों से बात हुई, उन्होंने बताया कि इस सेवा के माध्यम से आप सोसायटी के लिए बहुत कुछ कर सकते है. तो ठान लिया कि अब इस एक्जाम को देकर सिविल सर्वंट बनना ही है.

नुरूल कहते है कि मुझे जॉब करते हुए ही सिविल सर्विस की तैयारी करनी थी. क्योंकि ये मेरी मजबूरी थी. पिताजी को केवल 4 हजार रुपए सैलरी मिलती थी. नुरूल कहते है कि जो लोग ये सोचते है कि दो साल तो आपको इस एक्जाम की तैयारी के लिए देना ही पड़ता है, वो सच सोचते है. लेकिन आप अगर जॉब के साथ 8 घंटों तक पढ़ाई कर सकते है तो फिर आप सिविल सर्विस की तैयारी कर सकते है. इसी तरह ये भी मिथ है कि आपको इस एक्जाम को क्लियर करने के लिए कोचिंग की जरूरत होती ही है.

नुरूल का मानना है कि बिना कोचिंग के सिविल सर्विस क्लियर करना भी संभव है. कोचिंग सिर्फ आपको रास्ता दिखाती है. सिविल सर्विस एक्जाम का कोर्स डायनामिक है. वो कहते है कि कोचिंग मत लीजिए ऐसा नहीं कहूंगा, लेकिन जो नहीं ले पा रहा है वो ये भी नहीं सोचे कि इसके बिना एक्जाम पास होना संभव नहीं है. उनका कहना है कि इंटरनेट और आॅनलाइन मटेरियल का सही इस्तेमाल भी करना आपको आना जरूरी है.


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